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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 14: महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान  »  श्लोक 55-56h
 
 
श्लोक  1.14.55-56h 
तत: प्रीतेषु विधिवद् द्विजेषु द्विजवत्सल:॥ ५५॥
प्रणाममकरोत् तेषां हर्षव्याकुलितेन्द्रिय:।
 
 
अनुवाद
जब सभी ब्राह्मण संतुष्ट हो गए, तब उन पर प्रेम करने वाले राजा ने उन सबको प्रणाम किया। प्रणाम करते समय उनकी सारी इन्द्रियाँ हर्ष से विभोर हो गईं।
 
Then when all the Brahmins were duly satisfied, the king who loved them bowed down to all of them. While bowing down all his senses were overwhelmed with joy. 55 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)