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श्लोक 1.14.47  |
भवानेव महीं कृत्स्नामेको रक्षितुमर्हति।
न भूम्या कार्यमस्माकं नहि शक्ता: स्म पालने॥ ४७॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज! इस सम्पूर्ण पृथ्वी की रक्षा करने में आप ही समर्थ हैं। हममें इसकी रक्षा करने की शक्ति नहीं है, इसलिए इस भूमि का हमें कोई उपयोग नहीं है ॥47॥ |
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| ‘Maharaj! You alone are capable of protecting this entire earth. We do not have the power to protect it; therefore we have no use for the land. ॥ 47॥ |
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