| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 1: बाल काण्ड » सर्ग 14: महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान » श्लोक 42 |
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| | | | श्लोक 1.14.42  | ज्योतिष्टोमायुषी चैवमतिरात्रौ च निर्मितौ।
अभिजिद्विश्वजिच्चैवमाप्तोर्यामौ महाक्रतु:॥ ४२॥ | | | | | | अनुवाद | | ज्योतिष्तोम, आयुष्टोम यज्ञ, अतिरात्र यज्ञ दो बार, पांचवां अभिजित, छठा विश्वजित और सातवां-आठवां आप्तोरायम् - ये सभी महाक्रतु माने जाते हैं, जो अश्वमेध के उत्तरार्ध काल में किये गये थे। 42॥ | | | | Jyotishtom, Ayushtom Yagya, Atiratra Yagya twice, fifth Abhijit, sixth Vishvajit and seventh-eighth Aptorayam - all these are considered to be Mahakratus, which were performed in the later period of Ashvamedha. 42॥ | | ✨ ai-generated | | |
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