श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 14: महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.14.36 
पतत्त्रिणस्तस्य वपामुद्‍धृत्य नियतेन्द्रिय:।
ऋत्विक्परमसम्पन्न: श्रपयामास शास्त्रत:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद परम बुद्धिमान जितेन्द्रिय ऋत्विक् ने विधिपूर्वक अश्वकण्ड का गूदा निकाला और उसे शास्त्रविधि से पकाया ॥36॥
 
After this, the most intelligent Jitendriya Ritvik took out the pulp of Ashvakanda methodically and cooked it in the manner prescribed by the scriptures. 36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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