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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 14: महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.14.3 
कर्म कुर्वन्ति विधिवद् याजका वेदपारगा:।
यथाविधि यथान्यायं परिक्रामन्ति शास्त्रत:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
यज्ञ करने वाले सभी ब्राह्मण वेदों के पारंगत विद्वान थे; इसलिए वे न्याय और विधि के अनुसार उचित रीति से सब कार्य करते थे और शास्त्रानुसार कौन-सा कर्म किस क्रम से और किस समय करना चाहिए, इसका स्मरण करके प्रत्येक कार्य में प्रवृत्त होते थे॥3॥
 
All the Brahmins who performed the Yagya were accomplished scholars of the Vedas; Therefore, he used to perform all the tasks in a proper manner according to justice and law and used to engage in every task by remembering which action should be done in which sequence and at what time according to the scriptures. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)