Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
ramayan 1.10.31: "तब उसने मन को एकाग्र करके ऋषि को हवि अर्पित की और श्रेष्ठ ब्राह्मणों से वर माँगा, 'हे प्रभु! मुझे आपका तथा आपके पिता का आशीर्वाद प्राप्त हो।' उसने ऐसा इसलिए किया कि कहीं श्रेष्ठ ब्राह्मण ऋष्यश्रृंग या ऋषि विभाण्डक मुझे छलपूर्वक यहाँ लाए जाने का रहस्य जानकर मुझ पर क्रोधित न हो जाएँ।   |   ramayan सर्ग 1.10: अंगदेश में ऋष्यश्रृंग के आने तथा शान्ता के साथ विवाह होने के प्रसंग का विस्तार के साथ वर्णन   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 10: अंगदेश में ऋष्यश्रृंग के आने तथा शान्ता के साथ विवाह होने के प्रसंग का विस्तार के साथ वर्णन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.10.31 
अर्घ्यं च प्रददौ तस्मै न्यायत: सुसमाहित:।
वव्रे प्रसादं विप्रेन्द्रान्मा विप्रं मन्युराविशेत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
"तब उसने मन को एकाग्र करके ऋषि को हवि अर्पित की और श्रेष्ठ ब्राह्मणों से वर माँगा, 'हे प्रभु! मुझे आपका तथा आपके पिता का आशीर्वाद प्राप्त हो।' उसने ऐसा इसलिए किया कि कहीं श्रेष्ठ ब्राह्मण ऋष्यश्रृंग या ऋषि विभाण्डक मुझे छलपूर्वक यहाँ लाए जाने का रहस्य जानकर मुझ पर क्रोधित न हो जाएँ।
 
"Then, concentrating his mind, he offered oblations to the sage and asked for a boon from the greatest of Brahmins, 'O Lord! May I receive the blessings of you and your father.' He did so so that the great Brahmin Rishyashringa or the sage Vibhandak may not become angry with me after knowing the secret of how I was brought here deceitfully.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)