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श्लोक  1.10.3 
ऋष्यशृंगो वनचरस्तप:स्वाध्यायसंयुत:।
अनभिज्ञस्तु नारीणां विषयाणां सुखस्य च॥ ३॥
 
 
अनुवाद
"ऋषि ऋष्यश्रृंग सदैव वन में रहकर तपस्या और स्वाध्याय में लीन रहते हैं। वे स्त्रियों को भी नहीं पहचानते तथा विषय भोगों के सुखों से भी पूर्णतया अनभिज्ञ हैं।
 
"The sage Rishyashringa always stays in the forest and remains engaged in penance and self-study. He does not even recognize women and is completely unaware of the pleasures of sensual pleasures.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)