अहं वै पापधीर्नित्यं महापापं समाचरम्॥ ३१॥
कथं मे निष्कृतिर्भूयात् कं यामि शरणं विभो।
अनुवाद
'प्रभु! मेरा मन सदैव पाप में डूबा रहता है। मैंने निरंतर बड़े-बड़े पाप किए हैं। उनसे मेरा उद्धार कैसे हो? मैं किसकी शरण जाऊँ?॥ 31 1/2॥
‘Prabhu! My mind has always been immersed in sin. I have continuously committed big sins. How will I be saved from them? Whom should I seek refuge in?॥ 31 1/2 ॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥