Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 0.4.31-32h: 'प्रभु! मेरा मन सदैव पाप में डूबा रहता है। मैंने निरंतर बड़े-बड़े पाप किए हैं। उनसे मेरा उद्धार कैसे हो? मैं किसकी शरण जाऊँ?॥ 31 1/2॥ | ramayan सर्ग 0.4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा । ramayan काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अहं वै पापधीर्नित्यं महापापं समाचरम्॥ ३१॥
कथं मे निष्कृतिर्भूयात् कं यामि शरणं विभो।
अनुवाद
'प्रभु! मेरा मन सदैव पाप में डूबा रहता है। मैंने निरंतर बड़े-बड़े पाप किए हैं। उनसे मेरा उद्धार कैसे हो? मैं किसकी शरण जाऊँ?॥ 31 1/2॥
‘Prabhu! My mind has always been immersed in sin. I have continuously committed big sins. How will I be saved from them? Whom should I seek refuge in?॥ 31 1/2 ॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥