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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  0.4.28-29h 
इति ब्रुवाणं तमृषिं विमृश्य भयविह्वल:॥ २८॥
कलिक: प्राञ्जलि: प्राह क्षमस्वेति पुन: पुन:।
 
 
अनुवाद
जब उत्तंक मुनि इस प्रकार बोल रहे थे, तब कालिका नामक व्याध उनके वचनों पर विचार करके भयभीत हो गया और हाथ जोड़कर बार-बार कहने लगा, 'प्रभु! आप मेरा अपराध क्षमा करें।'
 
When Uttanka Muni was speaking in this manner, Kalika, the hunter, after thinking over his words, became frightened and with folded hands started saying repeatedly, 'Prabhu! Please forgive my crime.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)