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ramayan 0.4.25: जो मनुष्य अपनी स्त्री आदि का पालन करने के लिए दूसरे का धन चुराता है, उसका क्या लाभ है, क्योंकि अन्त में वह सबको छोड़कर अकेला ही परलोक चला जाता है ॥25॥   |   ramayan सर्ग 0.4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा   ।   ramayan काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  0.4.25 
परद्रव्यापहारेण कलत्रं पोषितं च यत्।
अन्ते तत् सर्वमुत्सृज्य एक एव प्रयाति वै॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपनी स्त्री आदि का पालन करने के लिए दूसरे का धन चुराता है, उसका क्या लाभ है, क्योंकि अन्त में वह सबको छोड़कर अकेला ही परलोक चला जाता है ॥25॥
 
What is the use of a man who steals someone else's wealth to support his wife etc., because in the end he leaves them all and goes alone to the other world. ॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)