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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  0.4.22 
अहो विधिर्वै बलवान् बाधते बहुधा जनान्।
सर्वसंगविहीनोऽपि बाध्यते तु दुरात्मना॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! सृष्टिकर्ता तो बड़ा शक्तिशाली है। वह मनुष्यों को तरह-तरह से कष्ट देता रहता है। यहाँ तक कि जो लोग सभी प्रकार की संगति से मुक्त हैं, उन्हें भी दुष्ट लोग कष्ट देते हैं।
 
Oh! The Creator is very powerful. He keeps troubling people in various ways. Even those who are free from all kinds of associations are tormented by evil-minded people.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)