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ramayan 0.4.18-19h: शान्तचित्त वाला संत अपने शत्रुओं और मूर्ख लोगों में सद्गुणों का वास देखकर भी उनका विरोध नहीं करता ॥18 1/2॥   |   ramayan सर्ग 0.4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा   ।   ramayan काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  0.4.18-19h 
विरोधिष्वपि मूर्खेषु निरीक्ष्यावस्थितान् गुणान्॥ १८॥
विरोधं नाधिगच्छन्ति सज्जना: शान्तचेतस:।
 
 
अनुवाद
शान्तचित्त वाला संत अपने शत्रुओं और मूर्ख लोगों में सद्गुणों का वास देखकर भी उनका विरोध नहीं करता ॥18 1/2॥
 
A saint with a calm mind does not oppose his enemies and foolish people even after seeing the presence of good qualities in them. ॥18 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)