श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 4: चैत्रमास में रामायण के पठन और श्रवण का माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनि की कथा  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  0.4.10-11 
तस्योपवनमध्यस्थं रम्यं केशवमन्दिरम्॥ १०॥
छादितं हेमकलशैर्दृष्ट्वा व्याधो मुदं ययौ।
हराम्यत्र सुवर्णानि बहूनीति विनिश्चित:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
सौवीरनगर के बगीचे में भगवान केशव का एक अत्यंत सुंदर मंदिर था, जो अनेक स्वर्ण कलशों से ढका हुआ था। शिकारी उसे देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने निश्चय किया कि वह यहाँ से बहुत सारा सोना चुराकर ले जाएगा। 10-11.
 
There was a very beautiful temple of Lord Keshav in the garden of Sauvirnagar, which was covered with many gold pots. The hunter was very happy to see it. He decided that he would steal a lot of gold from here and take it away. 10-11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)