श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 2: नारद सनत्कुमार-संवाद, सुदास या सोमदत्त नामक ब्राह्मण को राक्षसत्व की प्राप्ति तथा रामायण-कथा-श्रवण द्वारा उससे उद्धार  »  श्लोक 60-62h
 
 
श्लोक  0.2.60-62h 
नारद उवाच
ततो रामायणं ख्यातं राममाहात्म्यमुत्तमम्॥ ६०॥
निशम्य विस्मयाविष्टो बभूव द्विजसत्तम:।
ततो विप्र: कृपाविष्टो रामनामपरायण:॥ ६१॥
सुदासराक्षसं नाम चेदं वाक्यमथाब्रवीत्।
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं - उस समय राक्षस के मुख से रामायण का परिचय और श्री राम के माहात्म्य का वर्णन सुनकर द्विजश्रेष्ठ गर्ग को बड़ा आश्चर्य हुआ। श्री राम का नाम ही उनके जीवन का आधार था। वे ब्राह्मण देवता उस राक्षस पर दया करके सुदास से इस प्रकार बोले। 60-61 1/2
 
Naradji says - At that time, hearing the introduction of Ramayana from the mouth of the demon and the description of the greatness of Shri Ram, Dwijshrestha Garg was surprised. The name of Shri Ram was the support of his life. Those Brahmin gods were moved with compassion towards that demon and spoke to Sudas thus. 60-61 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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