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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 2: नारद सनत्कुमार-संवाद, सुदास या सोमदत्त नामक ब्राह्मण को राक्षसत्व की प्राप्ति तथा रामायण-कथा-श्रवण द्वारा उससे उद्धार  »  श्लोक 52-53
 
 
श्लोक  0.2.52-53 
राक्षस उवाच
अहो भद्र महाभाग नमस्तुभ्यं महात्मने॥ ५२॥
नामस्मरणमात्रेण राक्षसा अपि दूरगा:।
मया प्रभक्षिता: पूर्वं विप्रा: कोटिसहस्रश:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
राक्षस बोला - यह तो बड़े आश्चर्य की बात है! महाराज! बहुत बढ़िया! महात्मा आपको नमस्कार है। भगवान के नाम के स्मरण मात्र से राक्षस भी भाग जाते हैं। मैंने पहले करोड़ों ब्राह्मणों को खा लिया है। 52-53।
 
The demon said - This is a matter of great surprise! Sir! Great! Salutations to you Mahatma. Even the demons run away just by the mere recitation of the names of the Lord. I have devoured crores of Brahmins earlier. 52-53.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)