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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 2: नारद सनत्कुमार-संवाद, सुदास या सोमदत्त नामक ब्राह्मण को राक्षसत्व की प्राप्ति तथा रामायण-कथा-श्रवण द्वारा उससे उद्धार  »  श्लोक 43-44h
 
 
श्लोक  0.2.43-44h 
क्षुत्पीडित: पिपासार्त्तो नित्यं क्रोधपरायण:॥ ४३॥
कृष्णक्षपाद्युतिर्भीमो बभ्राम विजने वने।
 
 
अनुवाद
वह सदैव भूख-प्यास से पीड़ित रहता था और क्रोध से व्याकुल रहता था। उसके शरीर का रंग कृष्ण पक्ष की रात्रि के समान काला था। वह भयंकर राक्षस बन गया और निर्जन वनों में विचरण करने लगा।
 
He was always suffering from hunger and thirst and was overcome by anger. The colour of his body was as black as the night of the dark fortnight. He became a terrible demon and started roaming in the deserted forests. 43 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)