|
| |
| |
श्लोक 0.2.20-21h  |
महिमानं तु यन्नाम्न: पारं गन्तुं न शक्यते॥ २०॥
मनुभिश्च मुनीन्द्रैश्च कथं तं क्षुल्लको भजेत्। |
| |
| |
| अनुवाद |
| जिसकी महिमा की तुलना मनु आदि महर्षि भी नहीं कर सकते, उस तक मुझ जैसा तुच्छ प्राणी कैसे पहुँच सकता है? ॥20 1/2॥ |
| |
| How can a lowly creature like me reach the One whose glory cannot be matched even by Manu and the great sages? ॥20 1/2॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|