श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 2: नारद सनत्कुमार-संवाद, सुदास या सोमदत्त नामक ब्राह्मण को राक्षसत्व की प्राप्ति तथा रामायण-कथा-श्रवण द्वारा उससे उद्धार  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  0.2.15-16h 
नारद उवाच
नम: पराय देवाय परात्परतराय च॥ १५॥
परात्परनिवासाय सगुणायागुणाय च।
 
 
अनुवाद
नारदजी बोले- मैं उन परमपिता परमेश्वर श्री राम को प्रणाम करता हूँ जो सबसे परे हैं। मैं उन श्री राम को प्रणाम करता हूँ जिनका परमधाम सर्वश्रेष्ठ है और जो सगुण और निर्गुण रूप हैं।
 
Naradji said- I bow to the Supreme God Shri Ram who is beyond all the beyond. I bow to Shri Ram whose abode (Paramdham) is the best of the best and who is in the form of Saguna and Nirguna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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