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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 2: नारद सनत्कुमार-संवाद, सुदास या सोमदत्त नामक ब्राह्मण को राक्षसत्व की प्राप्ति तथा रामायण-कथा-श्रवण द्वारा उससे उद्धार  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  0.2.11 
अथायान्तं समुद्वीक्ष्य सनकाद्या महौजस:।
यथार्हमर्हणं चक्रुर्ववन्दे सोऽपि तान् मुनीन्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
उन्हें आते देख सनकादि आदि महामुनियों ने उनकी यथोचित पूजा की और नारद जी ने भी उन्हें सिर नवाया।
 
Seeing him coming, the mighty sages like Sankadi worshipped him appropriately and even Narada also bowed his head to them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)