श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 1: कलियुग की स्थिति, कलिकाल के मनुष्यों के उद्धार का उपाय, रामायणपाठ, उसकी महिमा, उसके श्रवण के लिये उत्तम काल आदि का वर्णन  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  0.1.42-43 
यस्त्वेतच्छृणुयाद् भक्त्या रामभक्तिपरायण:॥ ४२॥
स मुच्यते महापापै: पुरुष: पातकादिभि:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य श्री रामचन्द्रजी की भक्ति का आश्रय लेकर प्रेमपूर्वक इस कथा को सुनता है, वह बड़े-बड़े पापों और दुराचार आदि से मुक्त हो जाता है॥42-43॥
 
The person who listens to this story lovingly, taking shelter of the devotion of Shri Ramchandraji, becomes free from major sins and depravity etc. 42-43॥
 
इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे नारदसनत्कुमारसंवादे रामायणमाहात्म्ये कल्पानुकीर्तनं नाम प्रथमोऽध्याय:॥ १॥
इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके उत्तरखण्डमें नारद-सनत्कुमार-संवादके अन्तर्गत रामायणमाहात्म्यविषयक कल्पका अनुकीर्तन नामक प्रथम अध्याय पूरा हुआ॥ १॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)