श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 1: कलियुग की स्थिति, कलिकाल के मनुष्यों के उद्धार का उपाय, रामायणपाठ, उसकी महिमा, उसके श्रवण के लिये उत्तम काल आदि का वर्णन  »  श्लोक 39-40h
 
 
श्लोक  0.1.39-40h 
दुर्लभैव कथा लोके श्रीमद्रामायणोद्भवा॥ ३९॥
कोटिजन्मसमुत्थेन पुण्येनैव तु लभ्यते।
 
 
अनुवाद
श्री रामायण की कथा संसार में अत्यंत दुर्लभ है। करोड़ों जन्मों के पुण्यों के फलस्वरूप ही इसकी प्राप्ति होती है। ॥39 1/2॥
 
The story of Shri Ramayan is extremely rare in the world. It can be attained only when the merits of millions of births arise. ॥ 39 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)