श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 1: कलियुग की स्थिति, कलिकाल के मनुष्यों के उद्धार का उपाय, रामायणपाठ, उसकी महिमा, उसके श्रवण के लिये उत्तम काल आदि का वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  0.1.28 
वरं वरेण्यं वरदं तु काव्यं
संतारयत्याशु च सर्वलोकम्।
संकल्पितार्थप्रदमादिकाव्यं
श्रुत्वा च रामस्य पदं प्रयाति॥ २८॥
 
 
अनुवाद
रामायण काव्य अत्यंत उत्तम, मनोवांछित और मनोवांछित वर देने वाला है। इसे पढ़ने और सुनने वाले समस्त जगत को वह शीघ्र ही संसार सागर से पार कर देता है। उस मूल काव्य को सुनकर मनुष्य श्री रामचंद्रजी के परमपद को प्राप्त होता है। 28॥
 
Ramayana poetry is very good, desirable and gives the desired boon. He quickly makes the entire world, who recites and listens to it, cross the worldly ocean. By listening to that original poem, man attains the supreme status of Shri Ramchandraji. 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)