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ramayan 0.1.2: मैं भगवान श्री रामचंद्रजी को नमस्कार करता हूँ, जो देवी लक्ष्मी (सीता) के आनंदनिकेतन चित्रकूट में निवास करते हैं, जो आनंद के स्वरूप हैं और भक्तों को अभय प्रदान करते हैं॥2॥   |   ramayan सर्ग 0.1: कलियुग की स्थिति, कलिकाल के मनुष्यों के उद्धार का उपाय, रामायणपाठ, उसकी महिमा, उसके श्रवण के लिये उत्तम काल आदि का वर्णन   ।   ramayan काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 1: कलियुग की स्थिति, कलिकाल के मनुष्यों के उद्धार का उपाय, रामायणपाठ, उसकी महिमा, उसके श्रवण के लिये उत्तम काल आदि का वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  0.1.2 
चित्रकूटालयं राममिन्दिरानन्दमन्दिरम्।
वन्दे च परमानन्दं भक्तानामभयप्रदम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
मैं भगवान श्री रामचंद्रजी को नमस्कार करता हूँ, जो देवी लक्ष्मी (सीता) के आनंदनिकेतन चित्रकूट में निवास करते हैं, जो आनंद के स्वरूप हैं और भक्तों को अभय प्रदान करते हैं॥2॥
 
I salute Lord Shri Ramchandraji, who resides in Chitrakoot, the Anandniketan of Goddess Lakshmi (Sita) and who is the embodiment of bliss and gives fearlessness to the devotees. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)