श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 1: कलियुग की स्थिति, कलिकाल के मनुष्यों के उद्धार का उपाय, रामायणपाठ, उसकी महिमा, उसके श्रवण के लिये उत्तम काल आदि का वर्णन  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  0.1.16-17 
वद सूत मुनिश्रेष्ठ सर्वमेतदशेषत:॥ १६॥
कस्य नो जायते तुष्टि: सूत त्वद्वचनामृतात्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे महामुनि सूतजी! कृपया इन सब विषयों पर प्रकाश डालिए। आपके वचनों का अमृत पीकर कौन तृप्त नहीं होता? 16-17।
 
Great sage Sutji! Please shed light on all these matters. Who is not satisfied by drinking the nectar of your words? 16-17.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)