श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 0: श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण माहात्म्य  »  सर्ग 1: कलियुग की स्थिति, कलिकाल के मनुष्यों के उद्धार का उपाय, रामायणपाठ, उसकी महिमा, उसके श्रवण के लिये उत्तम काल आदि का वर्णन  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  0.1.15-16h 
यथा तुष्यति देवेशो देवदेवो जगद‍्गुरु:॥ १५॥
ततो वदस्व सर्वज्ञ सूत धर्मभृतां वर।
 
 
अनुवाद
हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ सर्वज्ञ सूतजी! कृपा करके हमें वह उपाय बताइए जिससे जगतगुरु परमेश्वर भगवान श्री रामचंद्रजी प्रसन्न हो सकें॥15 1/2॥
 
Omniscient Sutji, the best among the righteous! Please tell us the way by which the Supreme God, Lord Shri Ramchandraji, the world guru, can be pleased. ॥ 15 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)