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काण्ड 7 - दोहा 74b  |
तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि।
तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि॥ 74 ख॥ |
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| अनुवाद |
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| उसी प्रकार श्री रघुनाथजी अपने भक्त के हित के लिए उसका अभिमान हर लेते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि तुम अपने सारे मोह-माया को त्यागकर ऐसे भगवान का भजन क्यों नहीं करते? |
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| In the same way Shri Raghunathji takes away the pride of his devotee for his benefit. Tulsidasji says that why don't you worship such a God by abandoning all your delusions. |
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