| श्री रामचरितमानस » काण्ड 7: उत्तर काण्ड » दोहा 55 |
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| | | | काण्ड 7 - दोहा 55  | ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्हि काग सन जाइ।
सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाई॥55॥ | | | | अनुवाद | | | | पक्षीराज गरुड़जी ने भी जाकर काकभुशुण्डिजी से लगभग वही प्रश्न पूछे: "हे उमा! मैं तुम्हें आदरपूर्वक वह सब बताता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो।" | | | | The king of birds Garudaji also went and asked Kakabhushundiji almost the same questions. O Uma! I will tell you all that with respect, you listen attentively. | |
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