| श्री रामचरितमानस » काण्ड 7: उत्तर काण्ड » दोहा 48 |
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| | | | काण्ड 7 - दोहा 48  | तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।
जा कुहँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन॥48॥ | | | | अनुवाद | | | | तब मैंने मन में सोचा कि इसी कर्म से मैं उसी को प्राप्त हो जाऊंगा जिसके लिए योग, यज्ञ, व्रत और दान किया जाता है, फिर इसके समान दूसरा कोई धर्म नहीं है। | | | | Then I thought in my heart that by this very act I will attain the one for whom Yoga, Yajna, fasting and charity are performed, then there is no other religion like this. | |
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