| श्री रामचरितमानस » काण्ड 7: उत्तर काण्ड » दोहा 43 |
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| | | | काण्ड 7 - दोहा 43  | सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताई।
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ॥43॥ | | | | अनुवाद | | | | वह परलोक में कष्ट भोगता है, सिर पीटकर पश्चाताप करता है और (अपना दोष न समझकर) काल, कर्म और ईश्वर को झूठा दोष देता है। | | | | He suffers in the next world, repents by beating his head and (not understanding his own fault) falsely blames time, karma and God. | |
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