| श्री रामचरितमानस » काण्ड 7: उत्तर काण्ड » दोहा 19c |
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| | | | काण्ड 7 - दोहा 19c  | कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।
चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि॥19 ग॥ | | | | अनुवाद | | | | (काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे गरुड़जी! श्री रामजी का मन वज्र से भी कठोर और पुष्प से भी कोमल है। फिर कहिए, इसे कौन समझ सकता है? | | | | (Kakabhushundiji says-) O Garudaji! Shri Ramji's mind is harder than a thunderbolt and softer than a flower. Then tell me, who can understand it? | |
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