| श्री रामचरितमानस » काण्ड 7: उत्तर काण्ड » दोहा 100a |
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| | | | काण्ड 7 - दोहा 100a  | भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग।
करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग॥100 क॥ | | | | अनुवाद | | | | कलियुग में सभी लोग वर्णसंकर हो गए हैं, अपनी मर्यादा खो बैठे हैं, पाप करते हैं और (परिणामस्वरूप) दुःख, भय, रोग, शोक और (प्रियजनों से) वियोग पाते हैं। | | | | In Kaliyug, all people have become mixed castes and have lost their dignity. They commit sins and (as a result) get sorrow, fear, disease, grief and separation (from loved ones). | |
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