श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  चौपाई 12a.1
 
 
काण्ड 7 - चौपाई 12a.1 
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा॥
रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई॥1॥
 
अनुवाद
 
 प्रभु को देखकर वसिष्ठ मुनि का हृदय प्रेम से भर गया। उन्होंने तुरन्त एक दिव्य सिंहासन मँगवाया, जिसकी प्रभा सूर्य के समान थी। उसकी शोभा वर्णन से परे थी। ब्राह्मणों को प्रणाम करके श्री रामचंद्रजी उस पर बैठ गए।
 
Seeing the Lord, Sage Vasishtha's heart was filled with love. He immediately called for a divine throne, whose brilliance was like the Sun. Its beauty cannot be described. After bowing to the Brahmins, Shri Ramchandraji sat on it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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