श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  चौपाई 129.3
 
 
काण्ड 7 - चौपाई 129.3 
मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा॥
कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं॥3॥
 
अनुवाद
 
 जो मनुष्य इस कथा को बिना किसी छल के गाते हैं, उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जो मनुष्य इसे कहते, सुनते और इसकी स्तुति करते हैं, वे गाय के खुर से बने गड्ढे के समान संसार सागर से तर जाते हैं।
 
Those who sing this tale without any deceit, achieve fulfilment of their desires. Those who narrate and listen to it and praise it, cross the ocean of the world like a hole made by the hoof of a cow.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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