श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  चौपाई 128.1
 
 
काण्ड 7 - चौपाई 128.1 
मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी॥
तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई॥1॥
 
अनुवाद
 
 मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार यह कथा कही है, यद्यपि मैंने इसे पहले छिपाकर रखा था। जब मैंने तुम्हारे हृदय में प्रेम की प्रचुरता देखी, तब मैंने तुम्हें श्री रघुनाथजी की यह कथा सुनाई।
 
I told this story according to my wisdom, although I had kept it hidden earlier. When I saw the abundance of love in your heart, then I narrated this story of Shri Raghunathji to you.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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