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काण्ड 7 - चौपाई 109a.4  |
जनमत मरत दुसह दुख होई। एहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई॥
कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना॥4॥ |
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| अनुवाद |
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| परन्तु जन्म-मरण का असह्य दुःख उसे तनिक भी प्रभावित नहीं करेगा और उसका ज्ञान किसी भी जन्म में मिटेगा नहीं। हे शूद्र! मेरे प्रामाणिक (सत्य) वचन सुनो। |
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| But the unbearable pain of birth and death will not affect him at all and his knowledge will not be erased in any birth. O Shudra! Listen to my authentic (true) words. |
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