| श्री रामचरितमानस » काण्ड 6: युद्ध काण्ड » दोहा 92 |
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| | | | काण्ड 6 - दोहा 92  | जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि होहिं अपार।
सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥92॥ | | | | अनुवाद | | | | जैसे-जैसे भगवान् उसके सिरों को काटते हैं, वे और भी असीम होते जाते हैं। जैसे विषय-भोगों का भोग करने से काम (उनका भोगने की इच्छा) दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। | | | | As the Lord cuts off his heads, they become more and more boundless. Just as by consuming sensual pleasures, Kaam (desire to enjoy them) increases day by day. | |
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