| श्री रामचरितमानस » काण्ड 6: युद्ध काण्ड » चौपाई 89.2 |
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| | | | काण्ड 6 - चौपाई 89.2  | तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा॥
चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी॥2॥ | | | | अनुवाद | | | | कोसलपुरी के राजा श्री रामचंद्रजी प्रसन्नतापूर्वक उस दिव्य, अद्वितीय और तेजस्वी रथ पर सवार हुए। उस रथ को चार घोड़े खींच रहे थे, जो चंचल, मनमोहक, अजर, अमर और मन की गति के समान तीव्र गति से चलने वाले थे। | | | | King Shri Ramchandraji of Kosalpuri happily boarded that divine, unique and radiant chariot. It was drawn by four horses (of heaven) which were playful, charming, ageless, immortal and moved as fast as the speed of the mind. | |
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