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काण्ड 6 - चौपाई 66.1  |
उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥
भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई॥1॥ |
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| अनुवाद |
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| (भगवान शिव कहते हैं-) हे उमा! श्री रघुनाथजी उसी प्रकार मनुष्य लीला कर रहे हैं, जैसे गरुड़ सर्पों के समूह के साथ लीला करते हैं। जो अपनी भौंहों के इशारे से (बिना किसी प्रयास के) मृत्यु को भी निगल सकता है, क्या उसे ऐसा युद्ध शोभा देता है? |
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| (Lord Shiva says-) O Uma! Shri Raghunathji is performing the same human leela as Garuda plays with a group of snakes. Does such a fight befit the one who can devour even death with just a gesture of his eyebrows (without any effort)? |
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