| श्री रामचरितमानस » काण्ड 6: युद्ध काण्ड » चौपाई 24.1 |
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| | | | काण्ड 6 - चौपाई 24.1  | धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा॥
नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई॥1॥ | | | | अनुवाद | | | | धन्य है वह बंदर जो अपनी शील-हीनता त्यागकर अपने स्वामी के लिए सर्वत्र नाचता है। नाच-कूदकर, लोगों को लुभाकर, वह अपने स्वामी का कल्याण करता है। यही उसके धर्म की पूर्णता है। | | | | Blessed is the monkey who dances everywhere for his master, leaving his modesty behind. By dancing and jumping around, by luring people, he does good to his master. This is the perfection of his religion. | |
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