| श्री रामचरितमानस » काण्ड 6: युद्ध काण्ड » चौपाई 14.2 |
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| | | | काण्ड 6 - चौपाई 14.2  | दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई।
सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही॥2॥ | | | | अनुवाद | | | | सभा को भयमुक्त देखकर रावण ने हंसकर एक योजना बनाई और ये शब्द कहे - जिसके लिए सिर का गिरना भी सदैव शुभ माना गया है, उसके लिए मुकुट का गिरना अपशकुन कैसे हो सकता है? | | | | Seeing the assembly free from fear, Ravana laughed and devised a plan and said these words - For him for whom even the falling of heads has always been auspicious, how could the falling of the crown be a bad omen? | |
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