| श्री रामचरितमानस » काण्ड 6: युद्ध काण्ड » चौपाई 119a.4 |
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| | | | काण्ड 6 - चौपाई 119a.4  | परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी॥
सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा॥4॥ | | | | अनुवाद | | | | तीन प्रकार की अत्यंत सुखदायक (शीतल, मंद, सुगन्धित) वायु बहने लगी। समुद्र, तालाब और नदियों का जल निर्मल हो गया। चारों ओर सुन्दर शुभ संकेत दिखाई देने लगे। सबका मन प्रसन्न हो गया, आकाश और दिशाएँ पवित्र हो गईं। | | | | Three types of extremely soothing winds (cool, slow, fragrant) started blowing. The water of the sea, ponds and rivers became pure. There were beautiful omens all around. Everyone's mind is happy, the sky and directions are pure. | |
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