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काण्ड 6 - चौपाई 108.1  |
अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता॥
तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई॥1॥ |
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| अनुवाद |
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| हे प्रिये! अब आप कोई ऐसा उपाय कीजिए जिससे मैं इन नेत्रों से प्रभु के कोमल श्याम शरीर का दर्शन कर सकूँ। तब हनुमानजी श्री रामचंद्रजी के पास गए और उन्हें जानकीजी का कुशल समाचार सुनाया। |
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| O dear! Now you find a way so that I can see the soft dark body of the Lord with these eyes. Then Hanumanji went to Shri Ramchandraji and told him the good news of Janaki. |
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