श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  श्लोक f
 
 
काण्ड 5 - श्लोक f 
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥2॥
 
अनुवाद
 
 हे रघुनाथजी! मैं सत्य कह रहा हूँ और साथ ही आप सबके अंतर्यामी हैं (सब जानते हैं) कि मेरे हृदय में और कोई कामना नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी पूर्ण भक्ति प्रदान कीजिए और मेरे मन को काम आदि विकारों से मुक्त कर दीजिए।
 
O Raghunathji! I am telling the truth and besides, you are the inner soul of everyone (everyone knows) that I have no other desire in my heart. O Raghukul Shrestha! Give me your complete devotion and make my mind free from vices like lust etc.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas