श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  दोहा 52
 
 
काण्ड 5 - दोहा 52 
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥52॥
 
अनुवाद
 
 फिर उस मूर्ख को मेरा उदार (सुखद) सन्देश मौखिक रूप से कह दो कि सीताजी को उसके हवाले कर दो और उससे (श्री रामजी से) मिलो, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया है (ऐसा समझ लो)।
 
Then convey my generous (graceful) message to that fool verbally that hand over Sitaji to him and meet him (Shri Ramji), otherwise your death has come (understand that).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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