| श्री रामचरितमानस » काण्ड 5: सुन्दर काण्ड » दोहा 1 |
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| | | | काण्ड 5 - दोहा 1  | हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥ | | | | अनुवाद | | | | हनुमानजी ने उसे हाथ से स्पर्श किया, फिर प्रणाम करके कहा- भैया! श्री रामचन्द्रजी का कार्य किए बिना मुझे विश्राम कैसे मिल सकता है? | | | | Hanumanji touched it with his hand, then bowed to it and said- Brother! How can I rest without doing the work of Shri Ramchandraji? | |
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