|
| |
| |
काण्ड 5 - चौपाई 27.1  |
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥1॥ |
| |
| अनुवाद |
| |
| (हनुमान जी ने कहा-) हे माता! मुझे भी कोई चिन्ह (पहचान) दीजिए, जैसा श्री रघुनाथ जी ने दिया था। तब सीता जी ने अपनी चूड़ामणि उतारकर उन्हें दे दी। हनुमान जी ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। |
| |
| (Hanuman Ji said-) O mother! Please give me some mark (identification) like Shri Raghunath Ji had given me. Then Sita Ji took off her Chudaamani and gave it to him. Hanuman Ji accepted it happily. |
|
|
| ✨ ai-generated |
| |
|