श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  चौपाई 14.5
 
 
काण्ड 5 - चौपाई 14.5 
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानह जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥5॥
 
अनुवाद
 
 हे माता! कृपा के धाम भगवान अपने भाई लक्ष्मण सहित (शारीरिक रूप से) कुशलपूर्वक हैं, किन्तु आपके दुःख से दुःखी हैं। हे माता! आप मन में पश्चाताप न करें (हताश ​​होकर दुःखी न हों)। श्री रामचन्द्र के हृदय में आपके प्रति दुगुना प्रेम है।
 
O Mother! The Lord, the abode of grace, is well (physically) along with his brother Lakshmana, but is saddened by your sorrow. O Mother! Do not feel remorseful in your mind (do not feel sad by being disheartened). Shri Ramchandra has twice as much love for you in his heart.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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