| श्री रामचरितमानस » काण्ड 5: सुन्दर काण्ड » चौपाई 10.3 |
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| | | | काण्ड 5 - चौपाई 10.3  | चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥3॥ | | | | अनुवाद | | | | सीताजी कहती हैं- हे चन्द्रहास (तलवार)! श्री रघुनाथजी के विरह की अग्नि से उत्पन्न मेरी महान जलन को दूर कर दो, हे तलवार! तुम शीतल, तीव्र और उत्तम धारा बहाते हो (अर्थात तुम्हारी धारा शीतल और तीव्र है), मेरे दुःख का भार दूर कर दो। | | | | Sitaji says- O Chandrahas (sword)! Take away my great burning sensation caused by the fire of separation from Shri Raghunathji, O sword! You flow a cool, fast and excellent stream (i.e. your stream is cold and fast), take away the burden of my sorrow. | |
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