| श्री रामचरितमानस » काण्ड 5: सुन्दर काण्ड » छंद 3.1 |
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| | | | काण्ड 5 - छंद 3.1  | कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥1॥ | | | | अनुवाद | | | | वहाँ विचित्र रत्नों से जड़ी हुई स्वर्ण दीवार है, उसके भीतर अनेक सुंदर भवन हैं। चौराहे हैं, बाज़ार हैं, सुंदर सड़कें और गलियाँ हैं, सुंदर नगरी अनेक प्रकार से सुसज्जित है। हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल सैनिकों और रथों के समूहों की गिनती कौन कर सकता है! वहाँ अनेक रूपों में राक्षसों के समूह हैं, उनकी अत्यंत शक्तिशाली सेना का वर्णन नहीं किया जा सकता। | | | | There is a golden wall studded with strange gems, inside it are many beautiful houses. There are crossroads, markets, beautiful roads and lanes, the beautiful city is decorated in many ways. Who can count the groups of elephants, horses, mules and groups of foot soldiers and chariots! There are groups of demons in many forms, their extremely powerful army cannot be described. | |
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