श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  श्लोक 1
 
 
काण्ड 4 - श्लोक 1 
कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ
शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ।
मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ
सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ॥1॥
 
अनुवाद
 
 कुण्डपुष्प और नीलकमल के समान सुन्दर, गौर वर्ण और श्याम वर्ण वाले, अत्यन्त बलवान, ज्ञान के धाम, रूपवान, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेदों द्वारा प्रशंसित, गौओं और ब्राह्मणों के प्रिय, माया द्वारा मनुष्य रूप धारण करने वाले, उत्तम धर्म के लिए कवच, सबका कल्याण करने वाले, श्री सीता की खोज में लगे हुए, रघुकुल के श्रेष्ठ बन्धुओं में श्रेष्ठ, यात्री रूप में श्री राम और श्री लक्ष्मण, ये दोनों हमारे लिए निश्चित रूप से भक्तिमय हों।
 
Beautiful like the Kundapushpa and the blue lotus, fair and dark complexioned, extremely strong, the abode of knowledge, graceful, the best archer, praised by the Vedas, loved by the cows and the Brahmins, having taken human form by Maya, a shield for the best religion, beneficial to all, engaged in the search of Shri Sita, the best of the Raghukul brothers, Shri Ram and Shri Lakshman in the form of travelers, may both of them be definitely devotional to us.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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